| (नरेश और सुजाता गन्ना कटाई का काम करते हुए।) |
| (सुजाता, मंछीराम और अन्य साथी गन्ने के गट्ठरों को ट्रोली तक ले जा रहे हैं।) |
| (नरेश और राजेश ट्रोली में गन्ना लाद रहे हैं।) |
मुख्यतौर पर यह गन्ना चीनी मिलों में ही जाता है। गन्ने की किस्म और गुणवत्ता के आधार पर किसान को प्रति टन क़रीब 1900 से लेकर 2800 रुपया मिलता है। निजी (प्राइवेट) मिलों में गन्ने की कम कीमत मिल रही है। क्षेत्र में अभी तक सहकारी (को-ऑपरेटिव) चीनी मिलों का प्रभुत्व था, मगर बीते कुछ सालों से निजी मिलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। चीनी के साथ अब बायो ईंधन इथेनॉल बनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है जिसका उपयोग भविष्य में फ्लेक्स फ्यूल के रुप में होगा।
मोनसून का सीज़न ख़त्म होते ही अक्टूबर-नवंबर में गन्ना काटने का मौसम करीब आता है और महाराष्ट्र-गुजरात बोर्डर से अडे़ अपने गांवों-बस्तियों से हर साल हजारों आदिवासी मज़दूर गुजरात और महाराष्ट्र के गन्ना क्षेत्रो में रोज़गार के लिए निकल जाते हैं। क्योंकि वहां पानी की कमी के कारण खेती से अच्छी कमाई नहीं हो पाती। वे अपने लोग, अपना गाँव कुछ महिनों के लिए छोड़ देते हैं और जहाँ भी जाते है एक नया देस बना लेते हैं। रहने के लिए गन्ने के खेत या कुएं के नज़दीक अस्थायी तंबू या झोपड़ियां लगानी होती है। खाना पकाने के लिए ज़मीन पर तीन पत्थरों से बना चूल्हा और उपर खुला आसमान! इनकी रातें अंधेरे में ही कटती है। चिमनी की रोशनी और टोर्च के सहारे। स्नान करने के लिए पुराने कपड़े के पर्दे के पीछे मोटा पत्थर और कपड़े सुखाने के लिए दो पेड़ो के बीच बंधी रस्सी! अनाज की छोटी बोरियां, कपड़े, बिस्तर, बर्तन आदि रोजमर्रा का सामान नज़दीक में रखा हुआ है।
| (गन्ने के खेत और कूूूवेेेें के नज़दीक लगाया गया अस्थायी पड़ाव) |
इस समूह में तीन-चार परिवार के लोग है। आपस में, अपनों से लड़ना-झगड़ना न हो इसलिए अलग-अलग परिवार से लोगों को मिलाकर एक गन्ना कटाई समूह बनाया जाता है। कोई अक्कलकुवा से है तो कोई नंदुरबार के किसी गांव से। वे 'पाडवी' और 'नायक' नामक आदिवासी समूह से आते हैं। मुकादम समूह का चीफ़ या ठेकेदार होता है जिसके उपर व्यवस्थापन, कार्य की देखरेख और मज़दूर ढूंढ़ कर लाना जैसी जिम्मेदारियां होती है। आमतौर पर उसे बिचौलिया कहा जाता है। नरेश बताते है कि हर जोड़ा दिन भर में लगभग एक से डेढ़ टन यानि नौ सो से तैरह सो किलोग्राम गन्ना काटता है। 'कोयता' धारदार हथियार होता है जिससे गन्ना काटा जाता है। इस समूह में आठ कोयते है - दो का एक जोड़ा। उन्हें एक टन गन्ने की कटाई के बदले 300 रूपये मिलते है। अलग से 50 रूपया प्रति जोड़ा मुकादम को कमिशन मिलता है। यानि एक दंपति या जोड़े को 300 रुपया प्रति टन मिलता है।
नरेश की बात माने तो सहकारी मिलों में गन्ना कटाई मजदूरों को प्रति टन 280 रूपया के हिसाब से मज़दूरी मिलती है। जब कि मुकादम को 50 रूपया कमिशन मिलता है। मतलब एक जोड़े को 230 रूपया प्रति टन मिलता है। इसलिए उन्होंने निजी मिल में काम पर जानें का फ़ैसला किया। एक दंपति को हर सीज़न क़रीब चार से पांच महिने तक हर दिन बारह से चौदह घंटे काम करने के बाद 25,000 से 30,000 या अधिक तक की कमाई होती है।
सुजाता कहती है, "हमें खाना बनाने के लिए सुबह ठंड में साढ़े पांच बजे उठ जाना होता है। सात बजे से गन्ना कटाई का काम शुरू हो जाता है। दोपहर का भोजन कितने बजे होगा वह गन्ना कटाई कितनी हुई है उस पर निर्भर करता है।" वे चिलचिलाती धूप में भी काम करते रहते हैं और पूरे दिन में बहुत कम ब्रेक लेते है। गन्ना कटाई बहुत श्रम और ताक़त-बल का काम है। आम तौर पर शाम को सात बजे या पूरा अंधेरा होने तक काम करते है। मतलब रोज़ाना बारह से चौदह घंटे। अगले लगभग ढाई महिने तक उनकी यहीं दिनचर्या रहेगी।
| (सुबह के साढ़े सात बजे है। ठंड से छुटकारा पाने के लिए इन मजदूरों द्वारा गन्ने की पत्तीयां जलाई गई है।) |
जंगल से अडे़ हुए गन्ना प्रदेशों और नदियों के पट वाले क्षेत्रों में गन्ना कटाई के लिए आते समूह अपना काम शाम को पांच बजे निपटा लेटे है। क्योंकि वहां तेंदुआ, सांप, सूअर जैसे जंगली जानवरों के हमलों का ड़र बना रहता है। गन्ना काटते समय भी खेतों में सावधानी बरतनी होती है। जंगलों में मानव की बढ़ती चहल-पहल और दखलंदाजी के कारण जंगली जानवर मानव वसाहतों की ओर चल पडते है। महेन्द्र ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "हमारे साथ दूसरे दो समूह है जो अभी ताप्ती के पट वाले अंदरुनी क्षेत्रों में गन्ना कटाई के लिए गए हैं, वहां तेंदुआ देखे जाने से दहशत का माहौल है। इसलिए वहां गन्ना कटाई का काम क़रीब पांच से साढ़े पांच बजे तक रूक जाता है और सभी कृषि मजदूर शाम ढलने के पहले गांव की ओर प्रस्थान कर लेते हैं।"
बातों-बातों में उन्होंने विवाह और अन्य प्रथाओं के बारे में भी बताया। वे कहते हैं यहां के जैसे ही प्रकृति पूजन करते है मगर उनकी बातों में आदिवासी रीति-रिवाजों में विविध धर्मों की असर के कारण आए बदलाव साफ़ झलकते दिखे। उनके यहां विवाह को लेकर कोई कठोर बंधन नहीं है लेकिन दहेज़ प्रथा जीवित है। मूल्यवान गहनों का आकर्षण नहीं है। भागकर शादी करने में गुरेज़ नहीं करते। जी हां, नरेश और सुजाता का यहीं किस्सा है।
| (दोपहर को तैयार किए गए अस्थायी आश्रय स्थान में नरेश की मां पल्लू के साथ) |
मंगल पाडवी इस समूह में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, उन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई की है। आमतौर पर वे एक-दूसरे के साथ अपनी स्थानीय भाषा में ही बातचीत करते हैं। हालांकि जहां जाते हैं वहां की भाषा या बोली के शब्द ग्रहण कर लेते हैं। आगे, पढ़ाई छोड़कर गन्ना कटाई में क्यों लग गए - यह पूछने की हिम्मत मैंने नहीं की। क्योंकि यहां सब की समस्याएं लगभग एक जैसी ही है। एक बात गौर करने लायक है कि जिस देश में लोग गरीबी और बेरोजगारी के कारण सरकारी योजनाओं में उलझे हुए हैं, कुछ युवा किताब छोड़कर कट्टरपंथी बनने और तलवार उठाने पर तुले हुए हैं; इनके ख़्वाब डोक्टर या दंगाई बनने में भरमाये नहीं। नफ़रत की भाषा इनके भीतर नहीं है। इन्होंने संविधान की किताब नहीं पढ़ी होगी मगर महेनत, समता और बंधुत्व की भावना, सामूहिकता, व्यक्ति की गरिमा, एकता, समाजवाद, संसाधनों का समान वितरण और उपयोग जैसे आदर्श इनके दिलो-दिमाग में उतरे हुए है।
मंछीराम और राजेश दोनों भाई है। उनके पिताजी उनके साथ आए है, काम में हाथ बंटाते है। कुछ दिनों से दोनों भाई इनसे नाराज़ हैं, क्योंकि वे हरी डंठलों से होती रोज़ की कमाई नशा करने में उड़ा देते है। कुछ दिनों पहले मंछीराम ने गुस्से में भला-बुरा कह दिया था तब वे नाराज़ होकर रात को कहीं चल दिए थे। तीन दिन बाद पता चला - पंद्रह किलोमीटर दूर गांव में दूसरे समूह के साथ ठहरे हुए है। यह समूह के लोग भी उनके गांव से ही हैं। राजेश बताते है कि उन्होंने पहली बार ऐसा किया। हालांकि वापस आकर फिर से गन्ना कटाई के काम में लग गए।
अशोक नायक सातवीं और महेन्द्र पाडवी आठवीं कक्षा तक पढ़े। बाद में परिवार के साथ गन्ना-कटाई में जुट गए। इस समूह में ज़्यादातर कृषि मज़दूर युवा हैं। लगभग तीन साल से गन्ना कटाई का काम करते हैं। कोरोनाकाल में वे यहीं थे, सोनगढ़ के किसी गांव में। नरेश आगे बताते है, "गन्ना कटाई के लिए आये थे। मगर तालाबंदी के कारण वापस जाना पड़ा। हालांकि हमारे मुकादम ने ले जाने का इंतज़ाम कर दिया था। हम लोगों को एक ट्रक में पहले नंदुरबार सरकारी अस्पताल ले जाया गया, वहां मेडिकल चेकअप होने के बाद सब अपने-अपने घर गए थे।"
| (महेंद्र कोयते से गन्ना काटते हुए, पत्तीयां छीलते हुए और गन्ना साफ़ कर ज़मीन पर रखते हुए) |
जब भी उन्हें अपने गांव-परिवार की याद आती है या अपने खेतों में कुछ काम होता है, बीच में वे बारी-बारी अपने घर जा आते हैं। इन कृषि मज़दूरो का गांव-क्षेत्र यहां से क़रीब सो किलोमीटर दूर है। इसी बीच गन्ना कटाई का काम तो चालू ही रहता है। कभी-कभी चीनी मिल-मालिक काम रुकवा दें तो उस दिन वे आराम कर लेते हैं। इनके मुताबिक अभी उनके गांव सब के घर एक ही सदस्य मिलेगा क्योंकि ज्यादातर लोग रोज़गारी के लिए पलायन कर जाते हैं। बहुत कम समय के लिए वे अपने ख़ुद के घर रह पाते हैं।अभी अशोक अपने खेत में तुअर काटने के लिए गये हुए है। घर पर उसकी मां रहती है मगर उम्र के कारण खेतों में काम नहीं कर पाती। पास के गांव में रहते रिश्तेदारों की मदद उन्हें मिलती है। काम समाप्त होने पर अशोक को वापस अपने साथीयों के पास जल्द लौटना होगा।
पिछले बारह दिनों से यह समूह दक्षिण गुजरात के सूरत जिले में मांडवी तहसील के सठवाव गांव में रूका हुआ है जो कि आदिवासी बहुल इलाका है। कुछ दिन और यहां रुकेंगे। गन्ना कटाई का काम ख़त्म हो जाने के बाद फ़िर कहीं और दूसरे गांव की तरफ़ चल देंगे। अपना गांव, अपने लोगों से दूर - एक और अलग देस। मक़ाम बदलेगा, गन्ने का खेत वहीं।
सूरत, गुजरात
26 दिसंबर 2021