हे आज़ादी के परिंदो,यानि प्रकृति के उज़ालो।सहज सुकून का बादल भेजो नातुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।यंत्रो के बीच बसी हैबस्ती हमारीलगता है जंगली झाड़ीयों में फँसी हैजिंदगी हमारीअब स्वतंत्रता का साहिल भेजो नारसरंग-रंगरूप का गुलदस्ता भेजो नातुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।ढूंढती फिरती है नजरें हमारीकब गिरे और कब उठाऊँशाखो के पन्नो की बारिश भेजो नागुलम्होर की छाँव भेजो नाकोई उमंग सा जलतरंग भेजो नातुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।बन बैठे है यहाँ सबअंधे तमाशबीन!दिखा सके तेवर पर्वत सा भेजो नाधुमने गए थे मजे सेदेखा? कैसे सब अंतरंग हो गए!कहाँ गई धूप?तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।बदल रही है हवाएँ यहाँ कीजला सकूँ गर चराग भेजो नाढूँढ रहा हूँ सुकून कबसेनाप सके गहराई मुजसाबेधडक दरियादिल भेजो नासहज सुकून का बादल भेजो नातुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
Thursday, 7 December 2017
आज़ादी के परिंदे
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