Thursday, 7 December 2017

आज़ादी के परिंदे


हे आज़ादी के परिंदो,
यानि प्रकृति के उज़ालो।
सहज सुकून का बादल भेजो ना
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
यंत्रो के बीच बसी है
बस्ती हमारी
लगता है जंगली झाड़ीयों में फँसी है
जिंदगी हमारी
अब स्वतंत्रता का साहिल भेजो ना
रसरंग-रंगरूप का गुलदस्ता भेजो ना
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
ढूंढती फिरती है नजरें हमारी
कब गिरे और कब उठाऊँ
शाखो के पन्नो की बारिश भेजो ना
गुलम्होर की छाँव भेजो ना
कोई उमंग सा जलतरंग भेजो ना
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
बन बैठे है यहाँ सब
अंधे तमाशबीन!
दिखा सके तेवर पर्वत सा भेजो ना
धुमने गए थे मजे से
देखा? कैसे सब अंतरंग हो गए!
कहाँ गई धूप?
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
बदल रही है हवाएँ यहाँ की
जला सकूँ गर चराग भेजो ना
ढूँढ रहा हूँ सुकून कबसे
नाप सके गहराई मुजसा
बेधडक दरियादिल भेजो ना
सहज सुकून का बादल भेजो ना
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।

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