Sunday, 14 May 2023

गांव से शहर और शहर से गांव होना


जब कोई अपने गांव से शहर की तरफ़ हो जाता है, निकलता है या बरसों पहले निकला होगा रोज़गार, बेहतर जिंदगी या फिर अन्य संभावनाओं को तलाशने, उसने ये नहीं सोचा होगा कि जहां मैं जा रहा हूं वहां मुझे संघर्ष के बाद अच्छी जिंदगी जीने तो मिलेगी मग़र वो सुकून नहीं मिलेगा जो गांव की ब्लेक एंड व्हाइट जैसी कह जाने वाली लकीरों से मिलता है। जब हम गांव से निकलते हैं तो कई स्मृतियां साथ में लेके जाते हैं। वहीं तो है जो हमें शहर में रहते याद दिलाता रहता है कि गांव को भूलना नहीं है।

गांव से शहर या शहर से गांव पलायन कर जाना मतलब भागना नहीं होता! शहर में दूर से जीवित दिखाई देता हर पल इतना भी नीरस नहीं होता। शहर की दौड़ती-भागती जिंदगी हमें सुकून तलाशने का मौका जरूर देती है। वहां ना कोई पहचान, ना अपने लोग, फ़िर भी समाज बनता चला जाता है। 

ठीक वैसे गांव की जीवंतता के भीतर भी ख़ामोशी छिपी होती है। लेकिन वह हमें प्रकृति से संपर्कविहीन नहीं बनाती। अपना गांव, खेत-खलिहान, अपने लोग, भीगी मिट्टी की महक, पैड़-पौधो की हरियाली, वह लहलहाती-मुस्कुराती फसल, पंखी के बोल सब नज़र के सामने दीवार पे टंगी किसी तस्वीर की तरह आ जाते हैं।

गांव बहुत कुछ कमीयों के बावजूद हरा-भरा सा लगता है। क्योंकि गांव जीवंत होता है। वहां आपको कुछ गंवाना नहीं होता है। लेकिन उसी वक्त गांव को बहुत कुछ गंवाना होता है। गांव ही है जो अपनी बाहें फैला के खड़े होते हैं। और यह एक शहर जो हर वक्त कई गांवों को अपने-आप में समा लेने कि कोशिश में लगा रहता है!

अपनी आभासी, सीमित और ट्विटर, व्होट्सएप पर ट्रेंड करा देने वाली जिंदगी से निकलिए। गांव बाहें फैला के खड़ा है। अपने गांव, गांव के लोग, समाज और संस्कृति को जानने और समझने की कोशिश करे। जब भी समय मिले गांव को जी लेना चाहिए। खुद को जीवंत करने के लिए। क्योंकि गांव जीवंत होता है।

गिरीन्द्रनाथ झा के भीतर शहर भी है और गांव भी। वे कहते हैं - गांव मेरी जिन्दगी का सफेद पन्ना है, जिसे मैं अपने शब्दों से रंगता हूं और वहीं शहर मेरे लिए ई-मेल पता और फैसबुक टाइमलाइन की तरह है, जिसके जरिए मैं हर किसी से जुड़े रहने की कोशिश करता हूं।

हम सभी रोजमर्रा की जिंदगी में गांव और शहर के बीच संतुलन बनाए रखने में लगे रहते है। लेकिन क्या हम सिर्फ कल्पित वास्तविकताओं के सहारे 'जीवंत' रह सकेंगे? नहीं। उसके लिए हमें गांव से शहर और शहर से गांव होना ही पड़ेगा।

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फोटो कवर - इश्क़ में माटी सोना (गिरीन्द्रनाथ झा) 

Tuesday, 30 August 2022

"KhoobSurat - Hope For Heritage : Gem of a city in the columns of the Times of India"

 

"KhoobSurat - Hope For Heritage"

This beautiful book authored by Ashleshaa Khurana highlights the history and cultural heritage of Diamond City - Surat.

Ghalib never set foot in Gujarat and yet developed a great affinity towards the region, cuisine and culture of Surat. He was even tempted to visit the city but his ill health didn't permit him.

Inhabited with Persians, Armenians, Jews, Christians and others, people of Surat customed and accomodated diversity very well. As many as 84 different countries' flags sailed through the banks of river Tapi and fort of Surat till 18th century ('Choryasi' block of Surat district named after it).

Once the popular hub for global trade in ancient times, chief commercial city and principal port in the Mughal era, then declined for a short period and surpassed by Bombay, reborn in spite of disastrous floods and famines over the centuries, horrible plague epidemics followed by migrations, it has managed to bounce back every time.

Started with mere fishery village, followed by settlements on the banks, then shipbuilding industry to one of the fastest growing cities in the world; its journey shows that much water flown down the river banks of Tapi but regeneration is built into its genetic code. The spirit of Surtis and City have managed to survive time again and again to rise from ashes, fire and misery to reach the zenith of prosperity.

Content and photographs both are amazing.
Surely an all-time reference book for history lovers.


Wednesday, 29 December 2021

मक़ाम बदलेगा, गन्ने का खेत वहीं

 

(नरेश और सुजाता गन्ना कटाई का काम करते हुए।)

नरेश एक गन्ना उठाते है, थोड़ा सा आगे झुकते है और गन्ने को छीलने लगते है, साफ़ करके नीचे रख देते है। तुरंत अगले गन्ने की ओर बढ़ते है। फिर दूसरा, और तीसरा। उनकी पत्नी सुजाता, नरेश द्वारा छीले गए गन्ने उठाती है, ज़मीन पर एक-दूसरे के उपर रखती है और क़रीब दस से पंद्रह गन्नों का गट्ठर बनाकर डंठल से बांधती जाती है। 'पल्लू' उनकी बच्ची है और गट्ठरों के इर्द-गिर्द 'विष्णु' के साथ खेलती रहती है। दोपहर को लकड़ी के खंभों के सहारे अस्थायी रुप से तैयार किए गए झूले या हरी डंठलों और गन्ने के गट्ठरों आदि से ढंक कर बनाए गए आश्रय स्थान में बच्चें सो जाते हैं। दूसरी ओर नरेश की मां गन्ने को छिलने से निकलती हरी डंठल के गट्ठर बनाती जाती है। कटाई के दौरान बीच में इन हरी डंठलों को खरीदने के लिए आसपास के गांवों से किसान और पशुपालकों का आना-जाना लगा ही रहता है। क्योंकि उसका उपयोग पशुओं के चारे के रुप में किया जाता हैं। उनका रोज का खाना-पीना इससेे हुई कमाई से ही चलता है।

क़रीब सोलह लोगों का समूह है। आठ कोयते मतलब दो का एक जोड़ा। पर्याप्त मात्रा में गन्ना कटाई हो जाने के बाद एक ट्रेक्टर खेत में बनाए गए रास्ते पर आकर रुक जाता है। सुजाता, अशोक, मंछीराम समेत सभी साथी एक-एक कर गट्ठर का बोझ सिर पर उठाकर, संतुलन बनाते हुए ट्रेक्टर की ट्रोली तक ले जाते है। कभी-कभी गन्ना भरा हुआ ट्रेक्टर फिसलन की वजह से फंस जाता और पक्के रास्ते तक नहीं आ पाता तो सभी लोग रस्सी को आगे बांधकर ट्रेक्टर खींचने में लग जाते। सहारा देने की 'एकता के बल वाली' धारणा अभी भी सटीक बनाए रखी है। 'ज़ोर लगा के हईशा' वाली! मानवीयता को इन्हीं लोगों ने तो जिंदा रखा है‌। वैसे ट्रेक्टर-चालक के अनुभव और आने-जाने के रास्ते के हिसाब से ट्रोली में गन्ना लादा जाता है। ट्रेक्टर की ट्रोली में 10 से 15 टन गन्ना जाता है। ट्रक हो तो उससे अधिक।
(सुजाता, मंछीराम और अन्य साथी गन्ने के गट्ठरों को ट्रोली तक ले जा रहे हैं।)

(नरेश और राजेश ट्रोली में गन्ना लाद रहे हैं।)

मुख्यतौर पर यह गन्ना चीनी मिलों में ही जाता है। गन्ने की किस्म और गुणवत्ता के आधार पर किसान को प्रति टन क़रीब 1900 से लेकर 2800 रुपया मिलता है। निजी (प्राइवेट) मिलों में गन्ने की कम कीमत मिल रही है। क्षेत्र में अभी तक सहकारी (को-ऑपरेटिव) चीनी मिलों का प्रभुत्व था, मगर बीते कुछ सालों से निजी मिलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। चीनी के साथ अब बायो ईंधन इथेनॉल बनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है जिसका उपयोग भविष्य में फ्लेक्स फ्यूल के रुप में होगा।

मोनसून का सीज़न ख़त्म होते ही अक्टूबर-नवंबर में गन्ना काटने का मौसम करीब आता है और महाराष्ट्र-गुजरात बोर्डर से अडे़ अपने गांवों-बस्तियों से हर साल हजारों आदिवासी मज़दूर गुजरात और महाराष्ट्र के गन्ना क्षेत्रो में रोज़गार के लिए निकल जाते हैं। क्योंकि वहां पानी की कमी के कारण खेती से अच्छी कमाई नहीं हो पाती। वे अपने लोग, अपना गाँव कुछ महिनों के लिए छोड़ देते हैं और जहाँ भी जाते है एक नया देस बना लेते हैं। रहने के लिए गन्ने के खेत या कुएं के नज़दीक अस्थायी तंबू या झोपड़ियां लगानी होती है। खाना पकाने के लिए ज़मीन पर तीन पत्थरों से बना चूल्हा और उपर खुला आसमान! इनकी रातें अंधेरे में ही कटती है। चिमनी की रोशनी और टोर्च के सहारे। स्नान करने के लिए पुराने कपड़े के पर्दे के पीछे मोटा पत्थर और कपड़े सुखाने के लिए दो पेड़ो के बीच बंधी रस्सी! अनाज की छोटी बोरियां, कपड़े, बिस्तर, बर्तन आदि रोजमर्रा का सामान नज़दीक में रखा हुआ है।

(गन्ने के खेत और कूूूवेेेें के नज़दीक लगाया गया अस्थायी पड़ाव)

इस समूह में तीन-चार परिवार के लोग है। आपस में, अपनों से लड़ना-झगड़ना न हो इसलिए अलग-अलग परिवार से लोगों को मिलाकर एक गन्ना कटाई समूह बनाया जाता है। कोई अक्कलकुवा से है तो कोई नंदुरबार के किसी गांव से। वे 'पाडवी' और 'नायक' नामक आदिवासी समूह से आते हैं। मुकादम समूह का चीफ़ या ठेकेदार होता है जिसके उपर व्यवस्थापन, कार्य की देखरेख और मज़दूर ढूंढ़ कर लाना जैसी जिम्मेदारियां होती है। आमतौर पर उसे बिचौलिया कहा जाता है। नरेश बताते है कि हर जोड़ा दिन भर में लगभग एक से डेढ़ टन यानि नौ सो से तैरह सो किलोग्राम गन्ना काटता है। 'कोयता' धारदार हथियार होता है जिससे गन्ना काटा जाता है। इस समूह में आठ कोयते है - दो का एक जोड़ा। उन्हें एक टन गन्ने की कटाई के बदले 300 रूपये मिलते है। अलग से 50 रूपया प्रति जोड़ा मुकादम को कमिशन मिलता है। यानि एक दंपति या जोड़े को 300 रुपया प्रति टन मिलता है।

नरेश की बात माने तो सहकारी मिलों में गन्ना कटाई मजदूरों को प्रति टन 280 रूपया के हिसाब से मज़दूरी मिलती है। जब कि मुकादम को 50 रूपया कमिशन मिलता है। मतलब एक जोड़े को 230 रूपया प्रति टन मिलता है। इसलिए उन्होंने निजी मिल में काम पर जानें का फ़ैसला किया। एक दंपति को हर सीज़न क़रीब चार से पांच महिने तक हर दिन बारह से चौदह घंटे काम करने के बाद 25,000 से 30,000 या अधिक तक की कमाई होती है।

सुजाता कहती है, "हमें खाना बनाने के लिए सुबह ठंड में साढ़े पांच बजे उठ जाना होता है। सात बजे से गन्ना कटाई का काम शुरू हो जाता है। दोपहर का भोजन कितने बजे होगा वह गन्ना कटाई कितनी हुई है उस पर निर्भर करता है।" वे चिलचिलाती धूप में भी काम करते रहते हैं और पूरे दिन में बहुत कम ब्रेक लेते है। गन्ना कटाई बहुत श्रम और ताक़त-बल का काम है। आम तौर पर शाम को सात बजे या पूरा अंधेरा होने तक काम करते है। मतलब रोज़ाना बारह से चौदह घंटे। अगले लगभग ढाई महिने तक उनकी यहीं दिनचर्या रहेगी।

(सुबह के साढ़े सात बजे है। ठंड से छुटकारा पाने के लिए इन मजदूरों द्वारा गन्ने की पत्तीयां जलाई गई है।)

जंगल से अडे़ हुए गन्ना प्रदेशों और नदियों के पट वाले क्षेत्रों में गन्ना कटाई के लिए आते समूह अपना काम शाम को पांच बजे निपटा लेटे है। क्योंकि वहां तेंदुआ, सांप, सूअर जैसे जंगली जानवरों के हमलों का ड़र बना रहता है। गन्ना काटते समय भी खेतों में सावधानी बरतनी होती है। जंगलों में मानव की बढ़ती चहल-पहल और दखलंदाजी के कारण जंगली जानवर मानव वसाहतों की ओर चल पडते है। महेन्द्र ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "हमारे साथ दूसरे दो समूह है जो अभी ताप्ती के पट वाले अंदरुनी क्षेत्रों में गन्ना कटाई के लिए गए हैं, वहां तेंदुआ देखे जाने से दहशत का माहौल है। इसलिए वहां गन्ना कटाई का काम क़रीब पांच से साढ़े पांच बजे तक रूक जाता है और सभी कृषि मजदूर शाम ढलने के पहले गांव की ओर प्रस्थान कर लेते हैं।"

बातों-बातों में उन्होंने विवाह और अन्य प्रथाओं के बारे में भी बताया। वे कहते हैं यहां के जैसे ही प्रकृति पूजन करते है मगर उनकी बातों में आदिवासी रीति-रिवाजों में विविध धर्मों की असर के कारण आए बदलाव साफ़ झलकते दिखे। उनके यहां विवाह को लेकर कोई कठोर बंधन नहीं है लेकिन दहेज़ प्रथा जीवित है। मूल्यवान गहनों का आकर्षण नहीं है। भागकर शादी करने में गुरेज़ नहीं करते। जी हां, नरेश और सुजाता का यहीं किस्सा है।

(दोपहर को तैयार किए गए अस्थायी आश्रय स्थान में नरेश की मां पल्लू के साथ)

मंगल पाडवी इस समूह में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, उन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई की है‌। आमतौर पर वे एक-दूसरे के साथ अपनी स्थानीय भाषा में ही बातचीत करते हैं। हालांकि जहां जाते हैं वहां की भाषा या बोली के शब्द ग्रहण कर लेते हैं। आगे, पढ़ाई छोड़कर गन्ना कटाई में क्यों लग गए - यह पूछने की हिम्मत मैंने नहीं की। क्योंकि यहां सब की समस्याएं लगभग एक जैसी ही है। एक बात गौर करने लायक है कि जिस देश में लोग गरीबी और बेरोजगारी के कारण सरकारी योजनाओं में उलझे हुए हैं, कुछ युवा किताब छोड़कर कट्टरपंथी बनने और तलवार उठाने पर तुले हुए हैं; इनके ख़्वाब डोक्टर या दंगाई बनने में भरमाये नहीं। नफ़रत की भाषा इनके भीतर नहीं है। इन्होंने संविधान की किताब नहीं पढ़ी होगी मगर महेनत, समता और बंधुत्व की भावना, सामूहिकता, व्यक्ति की गरिमा, एकता, समाजवाद, संसाधनों का समान वितरण और उपयोग जैसे आदर्श इनके दिलो-दिमाग में उतरे हुए है।

मंछीराम और राजेश दोनों भाई है। उनके पिताजी उनके साथ आए है, काम में हाथ बंटाते है। कुछ दिनों से दोनों भाई इनसे नाराज़ हैं, क्योंकि वे हरी डंठलों से होती रोज़ की कमाई नशा करने में उड़ा देते है। कुछ दिनों पहले मंछीराम ने गुस्से में भला-बुरा कह दिया था तब वे नाराज़ होकर रात को कहीं चल दिए थे। तीन दिन बाद पता चला - पंद्रह किलोमीटर दूर गांव में दूसरे समूह के साथ ठहरे हुए है। यह समूह के लोग भी उनके गांव से ही हैं। राजेश बताते है कि उन्होंने पहली बार ऐसा किया। हालांकि वापस आकर फिर से गन्ना कटाई के काम में लग गए।

अशोक नायक सातवीं और महेन्द्र पाडवी आठवीं कक्षा तक पढ़े। बाद में परिवार के साथ गन्ना-कटाई में जुट गए। इस समूह में ज़्यादातर कृषि मज़दूर युवा हैं। लगभग तीन साल से गन्ना कटाई का काम करते हैं। कोरोनाकाल में वे यहीं थे, सोनगढ़ के किसी गांव में। नरेश आगे बताते है, "गन्ना कटाई के लिए आये थे। मगर तालाबंदी के कारण वापस जाना पड़ा। हालांकि हमारे मुकादम ने ले जाने का इंतज़ाम कर दिया था। हम लोगों को एक ट्रक में पहले नंदुरबार सरकारी अस्पताल ले जाया गया, वहां मेडिकल चेकअप होने के बाद सब अपने-अपने घर गए थे‌।"

(महेंद्र कोयते से गन्ना काटते हुए, पत्तीयां छीलते हुए और गन्ना साफ़ कर ज़मीन पर रखते हुए)

जब भी उन्हें अपने गांव-परिवार की याद आती है या अपने खेतों में कुछ काम होता है, बीच में वे बारी-बारी अपने घर जा आते हैं। इन कृषि मज़दूरो का गांव-क्षेत्र यहां से क़रीब सो किलोमीटर दूर है। इसी बीच गन्ना कटाई का काम तो चालू ही रहता है। कभी-कभी चीनी मिल-मालिक काम रुकवा दें तो उस दिन वे आराम कर लेते हैं। इनके मुताबिक अभी उनके गांव सब के घर एक ही सदस्य मिलेगा क्योंकि ज्यादातर लोग रोज़गारी के लिए पलायन कर जाते हैं। बहुत कम समय के लिए वे अपने ख़ुद के घर रह पाते हैं।अभी अशोक अपने खेत में तुअर काटने के लिए गये हुए है। घर पर उसकी मां रहती है मगर उम्र के कारण खेतों में काम नहीं कर पाती। पास के गांव में रहते रिश्तेदारों की मदद उन्हें मिलती है। काम समाप्त होने पर अशोक को वापस अपने साथीयों के पास जल्द लौटना होगा।

पिछले बारह दिनों से यह समूह दक्षिण गुजरात के सूरत जिले में मांडवी तहसील के सठवाव गांव में रूका हुआ है जो कि आदिवासी बहुल इलाका है। कुछ दिन और यहां रुकेंगे। गन्ना कटाई का काम ख़त्म हो जाने के बाद फ़िर कहीं और दूसरे गांव की तरफ़ चल देंगे। अपना गांव, अपने लोगों से दूर - एक और अलग देस। मक़ाम बदलेगा, गन्ने का खेत वहीं।

दिव्येश चौधरी
सूरत, गुजरात
26 दिसंबर 2021
*सभी तस्वीरें पूर्व सहमति के बाद ली गई है।

Thursday, 20 August 2020

કોરોના મહામારી, ચામાચીડિયુ અને મીડિયા રિપોર્ટસ


મૂડીવાદી અને સામ્યવાદી તાકતો વચ્ચે આરોપ-પ્રત્યારોપોના ઘેરાવ હેઠળ કોરોના વાયરસની ઉત્પતિ અંગે વૈજ્ઞાનિક સમીકરણો આધારિત મીડિયા રિપોર્ટસ જણાવે છે કે કોરોના મહામારી ચામાચીડિયાં(બેટ) વડે મનુષ્યમાં ફેલાઈ છે. છતાં તે અંગે કોઈ ઠોસ પુરાવા હજુ સુધી મળી શક્યાં નથી તેમજ ભવિષ્યમાં કોઈ ચોક્કસ કારણો જાણી શકાશે કે કેમ તેના પર પણ સવાલ છે. આ અહેવાલો જોઈ ઘરની નજીક દેખાતાં ચામાચીડિયાં કે તેમનાં રહેઠાણને હાનિ પહોંચાડશો નહિ.

હાલનું સંશોધન સૂચવે છે કે વાયરસના નજીકના જાણીતાં પૂર્વજોમાંના એકથી કોવિડ-૧૯ ૪૦ વર્ષ કરતાં પણ વધુ સમય પહેલાં બેટમાં ઉભરી આવ્યું હોઈ શકે. મનુષ્યને ચેપ લગાડવા માટે સક્ષમ કોરોનાવાયરસ દાયકાઓથી બેટ્સ તેમજ માનવ સહિત અન્ય પ્રજાતિઓ પર આવતો-ફરતો હોઈ શકે છે જે હમણાં સુધી ધ્યાને ન આવ્યો હોય અને હવે પ્રસાર વ્યાપક રીતે થયો હોય તેવું વૈજ્ઞાનિકોએ જણાવ્યું છે. જોકે વિશ્વ આરોગ્ય સંસ્થા (WHO-World Health Organisation) અને ભારતીય તબીબી સંશોધન પરિષદ (ICMR-Indian Council of Medical Research) એ સ્પષ્ટતા કરી હતી કે ચામાચીડિયાંમાંથી મનુષ્યમાં કોવિડ-૧૯ પ્રસારિત થવાનો કોઈ નક્કર પુરાવો નથી.

વણચકાસેલ સમાચારો અને સોશિઅલ મીડિયા પોસ્ટ્સ વ્યાપક વેરભાવ તરફ દોરી જાય છે. જેને કારણે દુનિયામાં અને દેશમાં જાહેરમાં ચામાચીડિયાંના રહેઠાણ તોડી પાડવું કે તેમને નુકસાન પહોંચાડવું જેવી ઘટનાઓ બની છે. ભારતનાં વનવિભાગે પણ‌ ચામાચીડિયાંને તેમજ તેમનાં રહેઠાણને જાહેરમાં નુકસાન પહોંચાડવા સામે ચેતવણી આપી છે.

ઘણાં સંશોધનકારો અને સંરક્ષણકારો (દક્ષિણ એશિયાઈ તેમજ કેનેડા) એ લખ્યું છે કે સાર્સ કોવિડ-૧૯ નું સચોટ મૂળ હજું અજ્ઞાત છે ત્યારે આ મહામારી માટે ચામાચીડિયાં કે અન્ય પ્રાણીને દોષ આપવું કેટલું વાજબી છે? 

ચામાચીડિયાંની હત્યા કરવી અને તેમના રહેઠાણોનો નાશ કરવો તે વધુ નુકસાનકારક છે કારણ કે તેનાથી બેટ તેમના રહેઠાણને ફેલાવી શકે છે. અત્યારસુધી જોવામાં આવેલાં અમુક વાયરસ જે ચામાચીડિયાં વડે ફેલાયા હતાં જેમ કે, નિપાહ, ઇબોલા, માર્બર્ગ, હેન્ડ્રો, સાર્સ અને માર્સ વાયરસ માનવભક્ષી સાબિત થયાં છે. આપણે યાદ રાખવું જોઈએ કે બધાં જંગલી પ્રાણીઓ કોઈને કોઈ વાયરસને પ્રસાર કરે છે. મોટાભાગના વાયરસ માનવી માટે હાનિકારક હોતાં નથી અને માનવ-મૃત્યુ નહિવત્ હોય છે. ફક્ત બેટ પર આંગળીઓ દર્શાવવું એ ખૂબ પક્ષપાતી અને અન્યાયી છે. જો આપણે તેમનાં રહેઠાણોનો નાશ કરતા રહીએ તો અન્ય પ્રાણીઓથી માણસોમાં અન્ય વાયરસ ફેલાવાની સંભાવના છે.

પ્રાણી શાસ્ત્ર મુજબ ચામાચીડિયું પક્ષી નથી પરંતુ એક પ્રકારનું સસ્તન પ્રાણી છે. તે પાંખો ધરાવતું હોઇ પક્ષીઓની માફક ઊડી પણ શકે છે. રાત્રિગામી ચામાચીડિયાનાં ખોરાકના આધારે મુખ્યત્વે બે પ્રકાર છે : (૧) જે ફળો અને મધ પર જીવે છે (૨) કીટકભક્ષી અનુક્રમે માઈક્રો કાઈરોપ્ટરન અને મેક્રો કાઈરોપ્ટરન. દેખાવના આધારે બે ભાગમાં વર્ગીકૃત કરી શકાય : (૧) ચામાચીડિયુ દેખાવમાં નાનું હોય અને (૨) વાગોળ મોટું હોય અનુક્રમે માઈક્રો બેટ અને મેક્રો બેટ. દક્ષિણ ગુજરાતનાં આદિવાસીઓ તેમને 'ચીરમીઠઅ' (ચામાચીડિયુ) અને 'વાગ્લઅ' (વાગોળ) નામથી ઓળખે છે.

આખા વિશ્વમાં ચામાચીડિયાંની વસ્તી સસ્તન પ્રાણીઓના આશરે 25% જેટલી છે અને તેની ૧૦૦૦થી વધુ પ્રજાતિઓ છે. ભારતમાં મુખ્યત્વે ૧૨૮ કરતાં વધુ પ્રજાતિઓ જોવા મળે છે. ફળભક્ષી (ફ્રૂટ બેટ) ચામાચીડિયુ કે વાગોળ પૂરેપૂરું ફળ ખાતું નથી. તે ફળના બીજને પચાવી શકતું નથી અને નીચે નાખી દે છે. તેમાંથી પાક વધુ થતો હોવાનું માનવામાં આવે છે જે આર્થિક લાભ આપે છે. ફળભક્ષી પરાગ રજ અને બીજનું પરિવહન કરી સંવર્ધન પ્રક્રિયાને વેગ આપે છે, જ્યારે કીટકભક્ષી ચામાચીડિયા દરરોજ હજારો ઉપદ્રવી જંતુઓને આરોગે છે અને જીવાણુ નિયંત્રણ કરે છે અને વાતાવરણને શુદ્ધ રાખવામાં મદદરૂપ થાય છે. આમ, ચામાચીડિયા પરાગ રજ વહન, જીવાત-નિયંત્રણ તથા વાતાવરણમાં સંતુલન જાળવવા જેવી ઇકો ફ્રેન્ડલી સેવાઓ આપે છે.

આજે વિવિધ માનવ-પ્રવૃતિઓનું વન્યપ્રાણી વસવાટો પર અતિક્રમણ વધતું જાય છે ત્યારે ભવિષ્યમાં બીજાં માનવભક્ષી વાયરસો ઉદભવવાનુ જોખમ વધવાના એંધાણ ચોક્કસથી વર્તાઈ રહ્યાં છે. વર્તમાન મહામારી એ પરોક્ષ રીતે અકુદરતી પ્રવૃતિઓ કે પર્યાવરણીય વિનાશ સિવાય બીજું કશું નથી. નવાં વાયરસોને ઉદભવતા રોકવા માટે માનવપ્રથાઓમાં ફેરફાર કરવાની ખાસ જરૂર છે. પ્રકૃતિ સાથે માનવી તેમજ પશુ-પક્ષીઓના સહઅસ્તિત્વને સમજી વન્ય પ્રાણી કે જીવ સંરક્ષણને લગતાં કાયદાકીય માળખાને વધુ મજબૂત કરવાની જરૂર છે. એ બાબત નોંધપાત્ર છે કે ભારતીય વન્યજીવન અધિનિયમમાં ચામાચીડિયાંની ભારતમાં જોવાં મળતી ૧૨૮ પૈકી માત્ર બે જ પ્રજાતિને સંરક્ષણ આપવામાં આવ્યું છે.

બીજી તરફ નક્કર વૈજ્ઞાનિક સંશોધનોની રાહ જોઈએ. સરકાર અને WHO દ્વારા બહાર પાડવામાં આવતા સાવચેતીના પગલાંઓનું ચુસ્તપણે પાલન કરીએ. સજાગ બની અફવાઓથી ગેરમાર્ગે ન દોરાઈએ અને અફવાઓ ન ફેલાય તે માટે પૂરતો સહયોગ આપીએ.

(તસ્વીરો : ૧૯ ઓગસ્ટ, ૨૦૨૦ સઠવાવ, માંડવી, સુરત
ઈન્ફો. ક્રેડિટ : ધી હિન્દુ આર્ટિકલ્સ
અંશ સુધાર : ૧૬ નવેમ્બર, ૨૦૨૧)

Monday, 29 July 2019

जिंदगी की दौड़ में...


गुल्लक में रखे सपनों को याद
कौन किया करता है
जिंदगी की दौड़ में...
जब भी अपने घर से निकले
सुबह और शाम के चक्कर में
फ़रिश्ते ख़ामोश है इंतजार में
साइकिल की ट्रिन-ट्रिन उन गलियों में
महोल्ला नाप देते थे तब दोपहर में
सहेलियों की खुश्बू थी बस एक पुकार में
अलग ही थी वो दुनिया
गुलम्होर के तले रंगीन शहर में
जिंदगी की दौड़ में...
सुबह और शाम के चक्कर में
चांद तक का सफ़र
कौन किया करता है
गुल्लक में रखे सपनों को याद
कौन किया करता है

Tuesday, 18 June 2019

आहिस्ता आहिस्ता आगोश में लेती ये जिंदगी!



गुलाबी ठंड में करवटें बदलती तो
कभी खुद-ब-खुद थरथराती हवायें
ख़ामोश फिज़ाओ में नई जान डाल रही थी। 
अचानक माहौल थोड़ा थम सा गया
मानो वकत का तराजू मेरी तरफ़ झुक गया हो
ठीक उसी तरह जैसे सूरज ओझल होता है।
भगदड़ में, हाँ भगदड़
सूरज के पीछे वाले कमरे में छुपा था मैं
शरारती बादल ने बता दिया होगा!
ज़िंदगी... ज़िंदगी मेरी पीछे भागी थी!
जनाब!
आहिस्ता आहिस्ता आगोश में लेती ये ज़िंदगी!

Thursday, 7 December 2017

आज़ादी के परिंदे


हे आज़ादी के परिंदो,
यानि प्रकृति के उज़ालो।
सहज सुकून का बादल भेजो ना
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
यंत्रो के बीच बसी है
बस्ती हमारी
लगता है जंगली झाड़ीयों में फँसी है
जिंदगी हमारी
अब स्वतंत्रता का साहिल भेजो ना
रसरंग-रंगरूप का गुलदस्ता भेजो ना
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
ढूंढती फिरती है नजरें हमारी
कब गिरे और कब उठाऊँ
शाखो के पन्नो की बारिश भेजो ना
गुलम्होर की छाँव भेजो ना
कोई उमंग सा जलतरंग भेजो ना
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
बन बैठे है यहाँ सब
अंधे तमाशबीन!
दिखा सके तेवर पर्वत सा भेजो ना
धुमने गए थे मजे से
देखा? कैसे सब अंतरंग हो गए!
कहाँ गई धूप?
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।
बदल रही है हवाएँ यहाँ की
जला सकूँ गर चराग भेजो ना
ढूँढ रहा हूँ सुकून कबसे
नाप सके गहराई मुजसा
बेधडक दरियादिल भेजो ना
सहज सुकून का बादल भेजो ना
तुम्हारे जैसा कोई सूरज भेजो ना।