गुल्लक में रखे सपनों को याद
कौन किया करता है
जिंदगी की दौड़ में...
जब भी अपने घर से निकले
सुबह और शाम के चक्कर में
फ़रिश्ते ख़ामोश है इंतजार में
साइकिल की ट्रिन-ट्रिन उन गलियों में
महोल्ला नाप देते थे तब दोपहर में
सहेलियों की खुश्बू थी बस एक पुकार में
अलग ही थी वो दुनिया
गुलम्होर के तले रंगीन शहर में
जिंदगी की दौड़ में...
सुबह और शाम के चक्कर में
चांद तक का सफ़र
कौन किया करता है
गुल्लक में रखे सपनों को याद
कौन किया करता है

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