गुलाबी ठंड में करवटें बदलती तो
कभी खुद-ब-खुद थरथराती हवायें
ख़ामोश फिज़ाओ में नई जान डाल रही थी।
अचानक माहौल थोड़ा थम सा गया
मानो वकत का तराजू मेरी तरफ़ झुक गया हो
ठीक उसी तरह जैसे सूरज ओझल होता है।
भगदड़ में, हाँ भगदड़
सूरज के पीछे वाले कमरे में छुपा था मैं
शरारती बादल ने बता दिया होगा!
ज़िंदगी... ज़िंदगी मेरी पीछे भागी थी!
जनाब!
आहिस्ता आहिस्ता आगोश में लेती ये ज़िंदगी!

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