Sunday, 14 May 2023

गांव से शहर और शहर से गांव होना


जब कोई अपने गांव से शहर की तरफ़ हो जाता है, निकलता है या बरसों पहले निकला होगा रोज़गार, बेहतर जिंदगी या फिर अन्य संभावनाओं को तलाशने, उसने ये नहीं सोचा होगा कि जहां मैं जा रहा हूं वहां मुझे संघर्ष के बाद अच्छी जिंदगी जीने तो मिलेगी मग़र वो सुकून नहीं मिलेगा जो गांव की ब्लेक एंड व्हाइट जैसी कह जाने वाली लकीरों से मिलता है। जब हम गांव से निकलते हैं तो कई स्मृतियां साथ में लेके जाते हैं। वहीं तो है जो हमें शहर में रहते याद दिलाता रहता है कि गांव को भूलना नहीं है।

गांव से शहर या शहर से गांव पलायन कर जाना मतलब भागना नहीं होता! शहर में दूर से जीवित दिखाई देता हर पल इतना भी नीरस नहीं होता। शहर की दौड़ती-भागती जिंदगी हमें सुकून तलाशने का मौका जरूर देती है। वहां ना कोई पहचान, ना अपने लोग, फ़िर भी समाज बनता चला जाता है। 

ठीक वैसे गांव की जीवंतता के भीतर भी ख़ामोशी छिपी होती है। लेकिन वह हमें प्रकृति से संपर्कविहीन नहीं बनाती। अपना गांव, खेत-खलिहान, अपने लोग, भीगी मिट्टी की महक, पैड़-पौधो की हरियाली, वह लहलहाती-मुस्कुराती फसल, पंखी के बोल सब नज़र के सामने दीवार पे टंगी किसी तस्वीर की तरह आ जाते हैं।

गांव बहुत कुछ कमीयों के बावजूद हरा-भरा सा लगता है। क्योंकि गांव जीवंत होता है। वहां आपको कुछ गंवाना नहीं होता है। लेकिन उसी वक्त गांव को बहुत कुछ गंवाना होता है। गांव ही है जो अपनी बाहें फैला के खड़े होते हैं। और यह एक शहर जो हर वक्त कई गांवों को अपने-आप में समा लेने कि कोशिश में लगा रहता है!

अपनी आभासी, सीमित और ट्विटर, व्होट्सएप पर ट्रेंड करा देने वाली जिंदगी से निकलिए। गांव बाहें फैला के खड़ा है। अपने गांव, गांव के लोग, समाज और संस्कृति को जानने और समझने की कोशिश करे। जब भी समय मिले गांव को जी लेना चाहिए। खुद को जीवंत करने के लिए। क्योंकि गांव जीवंत होता है।

गिरीन्द्रनाथ झा के भीतर शहर भी है और गांव भी। वे कहते हैं - गांव मेरी जिन्दगी का सफेद पन्ना है, जिसे मैं अपने शब्दों से रंगता हूं और वहीं शहर मेरे लिए ई-मेल पता और फैसबुक टाइमलाइन की तरह है, जिसके जरिए मैं हर किसी से जुड़े रहने की कोशिश करता हूं।

हम सभी रोजमर्रा की जिंदगी में गांव और शहर के बीच संतुलन बनाए रखने में लगे रहते है। लेकिन क्या हम सिर्फ कल्पित वास्तविकताओं के सहारे 'जीवंत' रह सकेंगे? नहीं। उसके लिए हमें गांव से शहर और शहर से गांव होना ही पड़ेगा।

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फोटो कवर - इश्क़ में माटी सोना (गिरीन्द्रनाथ झा) 

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