Monday, 29 July 2019

जिंदगी की दौड़ में...


गुल्लक में रखे सपनों को याद
कौन किया करता है
जिंदगी की दौड़ में...
जब भी अपने घर से निकले
सुबह और शाम के चक्कर में
फ़रिश्ते ख़ामोश है इंतजार में
साइकिल की ट्रिन-ट्रिन उन गलियों में
महोल्ला नाप देते थे तब दोपहर में
सहेलियों की खुश्बू थी बस एक पुकार में
अलग ही थी वो दुनिया
गुलम्होर के तले रंगीन शहर में
जिंदगी की दौड़ में...
सुबह और शाम के चक्कर में
चांद तक का सफ़र
कौन किया करता है
गुल्लक में रखे सपनों को याद
कौन किया करता है

Tuesday, 18 June 2019

आहिस्ता आहिस्ता आगोश में लेती ये जिंदगी!



गुलाबी ठंड में करवटें बदलती तो
कभी खुद-ब-खुद थरथराती हवायें
ख़ामोश फिज़ाओ में नई जान डाल रही थी। 
अचानक माहौल थोड़ा थम सा गया
मानो वकत का तराजू मेरी तरफ़ झुक गया हो
ठीक उसी तरह जैसे सूरज ओझल होता है।
भगदड़ में, हाँ भगदड़
सूरज के पीछे वाले कमरे में छुपा था मैं
शरारती बादल ने बता दिया होगा!
ज़िंदगी... ज़िंदगी मेरी पीछे भागी थी!
जनाब!
आहिस्ता आहिस्ता आगोश में लेती ये ज़िंदगी!